शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

बदलते वक्त के साथ (चित्र आधारित) naye lekhan naye dastkhat froup me first aayi kahani

बदलते वक्त के साथ
(चित्र आधारित)
"बाबूजी, मुझे ऒर पढना हॆ", संतोष ने पिता से कहा।
"ठीक हॆ बेटा, बोलो कितने पॆसे लगेंगे? ", पिता ने पूछा।
" बाबूजी, मुझे दिल्ली जा कर कोचिंग लेनी हॆ"।
"बोलो कितने लगेंगे, इंतजाम कर दूं" ।
....
एक बहुत छोटे से किसान ने अपने बेटे को पढाने के लिए अपनी हॆसियत से बढ कर खर्चा किया था। आज उसे सब याद आ रहा था। बेटा बस इच्छा जाहिर करता ऒर वह उसकी पूर्ति की राह खोजने लगता। धीरे धीरे बेटे की ऊँचाई बढने लगी। बाप के वर्तमान को कुचल बेखबर बेटा अब अपनी इच्छाओं का आकाश ऒर विस्तृत करने को तत्पर था। देश की सीमाओं दीवारों के पार अब उसे अपना भविष्य नजर आ रहा था।
निर्लज्ज हो उसने फिर कहा,
"बाबूजी मुझे अमेरिका जाना हॆ" ।
बाप चकित हो गरदन उठा ऊँचाई पर खडे बेटे की ओर देखा, जिसके कदमों तले उसका पूरा वर्तमान दबा पड़ा था। अपनी हर जरूरत हर इच्छा को मार, उनकी सीढ़ी बना बेटे को वह उठाता रहा। बाप सतर्क हो गया, बेटे की मंशा को भांप।
"जरूर जाओ पर उससे पहले मेरी उन सभी अरमानों की, जरूरतों की कीमत अदा कर जाओ जिस पर पांव धर तुम उड़ान भरने को तत्पर हो", कहते हुए पिता ने उसके पांव तले से अपने भविष्य को बचा लिया।
कलियुगी पिता भी होशियार हो चला था।

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