शनिवार, 19 नवंबर 2016

वक़्त ने किया क्या हसीं सितम

वक़्त ने किया क्या हसीं सितम

(चित्र आधारित कथा)
 खम्बे की ओट से रामाशीष जी उसे आज फिर देखा,
“हां, बिलकुल वही है. वही चेहरा, वही मुस्कान वही स्निग्द्धता”, उनके दिल से बल्लियों उछलते आज भी यही आवाज आई.
दो दिनों से लगातार इस पर्यटक स्थल पर सविता को देख वे बेकाबू हुए जा रहें थें. सविता, उनकी ब्याहता जिसके साथ उन्होंने चालीस वर्ष पूर्व सात फेरे लिए थे. पर सामने आने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी. यादों का चलचित्र मानस पर रील घुमाने लगा. कोई बीस-इक्कीस वर्ष के रहें होंगे, सविता की डोली बस रात ही उतरी थी उनके आँगन. जयमाल तो तब होते ही नहीं थे. फेरों के वक़्त घूँघट के पार से निरखि छवि दिल को तरंगित किये हुई थी. जाने कब सारे रस्म-रिवाज पूरे हो कि वह अपनी जीवन संगनी को भरपूर नज़रों से देख पाता, यही सोचता आँखे मलता बिस्तर छोड़ वह आँगन की तरफ बढ़ चला था.
“ लल्ला ले के जाओ अपनी बहन को अपने साथ, जब तक तयशुदा दहेज़ तुमलोग नहीं पहुँचाओगे मेरा बेटा इसके पास तक नहीं फटकेगा”,  माँ की कडकती आवाज के समक्ष उसके टूटते दिल की चनचनाह्ट अपना दम तोड़ बैठी थी. सर झुकाए उसके साले साहब ने सविता के हाथ को पकड़ कर कहा था,
“चलो....”,
और उसी समय सर से पल्लू खिसक गया था. पहली और आखिरी बार उसने अपनी ब्याहता के मुखड़े को देखा था. उसकी जो मनोहारी छवि ह्रदय में अंकित हुई थी, वह अमिट रह गयी, कभी फिर किसी ने वहां दस्तक तक नहीं दिया था. दो दिनों पूर्व वक़्त और झुर्रियों की साज़ तले छिपी उस सूरत को उन्होंने पहचान लिया था. अपनी समस्त ऊर्जा को समेट रामाशीष जी खम्बे के पीछे से उसके सामने खड़े हो गएँ. मिचमिचाती दृगों में एक भाव सा उभरा ही था कि आवाज आई,
“चलो न दादी देर हो रही है”, और फिर एक हाथ खींचता हुआ उन की सविता को दूर कर दिया. शायद इस बार हमेशा के लिए.



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें